आम आदमी का अनुभव , संसार में सुख भी है और दु:ख भी है।

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संसार सन्मात्र(सत्ता मात्र)है।

संसार भला है या बुरा है, सुखद है या दु:खद,सत्य है या मिथ्या, नाशवान् है या शाश्वत आदि-ये सब व्याख्याएं हैं।
व्याख्याएं व्याख्याता और उसके अनुभव पर आश्रित होने के कारण भिन्न भिन्न होतीं हैं।
एक ही वस्तु के सम्बन्ध में अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार व्यक्तियों के अनुभव भिन्न भिन्न होते हैं।
संसार दु:खद है किंवा सुखद-इस विषय में भी तीन प्रकार के अनुभव देखने में आते हैं:-
१-आम आदमी का अनुभव
संसार में सुख भी है और दु:ख भी है।
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह:क्षमा सत्यं दम:शम:।
सुखं दु:खं—
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा:।।गीता१०/४-५
संसार द्वन्द्वात्मक है-यह सभी का अनुभव है।
२-विवेकी पुरुषों का अनुभव
विवेकी पुरुषों की दृष्टि से संसार दु:खमय है।”दु:खमेव सर्वं विवेकिन:”योगसूत्र।भगवान् बुद्ध के चार आर्य-सत्यों में पहला सत्य है-“दु:ख है”।सुख भी है ऐसा वे नहीं मानते।भर्तृहरि भी कहते हैं-प्रतीकारो व्याधे:सुखमिति विपर्यस्यति जन:।बहुत तीव्र प्यास थी, शीतल जल मिल जाए-आदमी कहता है”आनन्द आ गया”।कहाँ है आनन्द?प्यास की निवृत्ति हुई।
ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्त:कौन्तेय न तेषु रमते बुध:।।गीता५/२२
अर्थात् विषयों के जो भोग(सुखानुभव)हैं-वे दु:ख के लिए कारण हैं।उनका अंत दु:खों के रूप में होता है, इसलिए विवेकी उनमें रस नहीं लेता।
३-सिद्ध पुरुषों या भक्तों का अनुभव
चारों ओर भगवान् का लीला-विलास है।आनन्द ही आनन्द है।लोमश ऋषि श्राप दे रहे हैं, कागभुशुण्डि जी प्रसन्न हो रहे हैं कि प्रभु इस लीला(श्राप)द्वारा मेरा ज्ञा नाभिमान नष्ट करना चाहते हैं।
युंजन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शमत्यन्तं सुखमश्नुते।।गीता६/२८
अर्थात् अपने आप को सदा परमात्मा में लगाता हुआ पाप रहित योगी सुखपूर्वक ब्रह्म प्राप्ति रूप अत्यंत सुख का अनुभव करता है।
ये तीन व्यक्ति नहीं हैं।हमीं हैं जो क्रमिक विकास करते हुए तीसरी अवस्था को प्राप्त कर सकते हैं-ऐसा शास्त्रों का, संतों का मत है-इसलिए हमें शाश्वत आनन्द प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयास करना चाहिए।

Courtesy-Nancy Jha

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